About Scientist History

At the same time has led to so many great scientists
10 लाख सालों में एक ही समय पर इतने सारे महान वैज्ञानिक कैसे पैदा हो गए…
मानव इतिहास के 10 लाख सालों में एक ही समय पर इतना सारे महान वैज्ञानिक कैसे पैदा हो गए..न इससे पहले न इसके बाद कोई नया मौलिक सूत्र या नया नियम नहीं आया…
( ये सवाल बिलकुल वाजिब है। हमारे मन में भी यह सवाल उठा था लेकिन आगे की बात पढी तो किस्सा समझ में आ गया )
ऐसा लगता है। जैसे उस समय ब्रिटिश, पड़ोसी व मित्र देशों में विज्ञान की लौटरी लग गई हो ये सवाल तो कोई हिन्दुस्तानी ही उठा सकता है…समझदार लोग अपने ऊपर गर्व करें..बाकी पुरातन भारत का इतिहास पढ़े…कुछ प्रारंभिक तथ्य प्रस्तुत है…!
जिस समय न्यूटन के पूर्वज जंगली लोग थे, उस समय महर्षि भाष्कराचार्य ने पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर एक पूरा ग्रन्थ रच डाला था। किन्तु आज हमें सिखाया जाता है। कि ब्रिटेन के उस वैज्ञानिक ने ये बनाया जर्मनी के उस वैज्ञानिक ने वो बनाया…
जबकि सच ये है कि भारत से चुरा कर ले जाए महान ग्रन्थ इन लोगो के हाथ लग गए थे। और ये उन पर टूट पड़े.. उन्होने इन के श्लोको को पूरी तरह खगोल दिया और इनमें छुपे रहस्यो को उजागर कर अपने नाम से दुनिया के आगे पेश किया… हमारे विज्ञान में कोई पेटेंट कराने की जरूरत नहीं थी। क्यूंकि तब ब्रह्माण्ड के रहस्य हम ही जानते थे। किन्तु चोर ने जब चोरी कर ली... तो चोरी के माल को अपना बताने के लिए वो कागजी रजिस्ट्रेशन का सहारा लेने लगा.
आप को अचरज हुआ लेकिन ये सच्चाई है। वो रेनेसां पिरियड था। युरोप में नव जागृति काल प्रिन्टिंग टेक्नोलोजी और प्रिन्ट मिडिया आ जाने से समान्य मानवी तक ज्ञान पहुंचने लगा पढाई लिखाई पर ध्यान गया, बडे बडे पुस्तक छपने लगे, बडे बडे विचारक पैदा होने लगे… बुद्धजीवियों के क्लब खूलने लगे आज की तरह ऐसा नही होता था। की माईकल दारू पी के दंगा करते थे। वो सब आपस में मिल के ज्ञान की, अपने नए विचार की, अपनी नयी खोज की बातें करते थे । नया ज्ञान था ना, तो उत्साह था । उस युग को ज्ञान का विस्फोट युग भी कहा जाता है । आज की दुनिया को जो भी अच्छा बुरा मिला उस समय का परिणाम है।
भारत के विज्ञान के लिए इस तरह इतराना ठीक नही उन लोगों के पूरखें भी सनातनी हिन्दु ही थे, हिन्दु ज्ञान उनकी लाइब्रेरी में पहले से ही मौजुद था, उन की युरोपिय भाषा में ही था सब ग्रीस का हिन्दुत्व साइन्स पर ज्यादा भार देता था, भगवान कृष्ण का हिन्दुत्व था। द्वारिका डुबने से पहले भगवान के वारिस यादव सेना लेकर ग्रीस तक अश्वमेध का घोडा लेकर चले गए थे। भारत के धनपतियों ने इजराईल के धनपतियों की संगत में आकर सोने के सिक्कों के बल पर भारत के हिन्दुत्व को आसमान की सैर करने को भेज दिया, योग और झूठे चमत्कारों में डाल दिया। जब की जमीनी काम के लिए ग्रीस और युरोप के हिन्दुत्व को खतम करने के बाद धनपतियों के प्यादे इसाईयों ने हिन्दुओं का साइन्स वाला हिस्सा अपने पास रख लिया और बाकी बहुत सा ज्ञान एलेक्जांड्रिया लाईब्रेरी में था वो पूरी लायब्रेरी ही जला डाली…
पता नही कब भारत के लोग आसमान से जमीन पर आएंगे अपना संभाल नही सके और दुसरे लोग करते है। तो अपना होने का दावा ठोक देते है। वो भी सनातनी लोगों के वारिस है। धनपति राक्षसों ने उनकी आस्था बदल दी है और हिन्दुओं के दुश्मन बनाकर अपने पक्ष में कर लिए है…!
ये सत्य है उस नव जागृति काल में बडे बडे वैज्ञानिक और विचारक पैदा हो गए थे। लेकिन तुरंत ही धनपति राक्षस डर गए थे। और हरकत में आ गए थे। अच्छे अच्छों को खरीद लिया और मिडिया को अपने कंट्रोल में कर लिया था। वैज्ञानिकों को अपने नौकर बना कर अपने व्यापार हेतु खोजबीन करवाने लगे जो आज तक जारी है। बुद्धीजीवियों को खरीद कर हिन्दुत्व खतम करने के काम में लगा दिया…
दोनो की बात अपने अपने हिसाब से सही है। कुछ ही समय में इतने वैज्ञानिक पैदा कैसे हो सकते थे…
महान वैज्ञानिक निकोला टेस्ला प्रेरणा के लिए एक ग्रंथ हाथ में लेकर बैठा रहता था। वो कोई इसाई का लिखा ग्रन्थ नही था। हिन्दु ग्रंथ था । हमारा हिन्दुत्व या उनका हिन्दुत्व कहने का कोइ मतलब नही है। हिन्दुत्व सनातन है और सर्वव्यापी था। आज उसका व्याप घटकर आधे भारत में भी नही रहा है…!
हिटलर का स्वस्तिक भी उसके पूरखो का था। हिटलर खुद को आर्य कहता था। उसने खुद को उन्होंने अपने किताब “हिटलर एंड हिज गॉड” में आप पढ़ सकते हैं उन्होंने हिन्दू होने का प्रमाण दिया है…!
हिन्दूस्थान वालों को समझना चाहिए कि चीजे भारत की ना कह कर सनातन की है। ऐसा मानना चाहिए युरोप और मिडल इस्ट भी कभी हिन्दुओं का स्थान था। अगर आज भी नही संभले, जमीन पर नही आए तो ये व्यापारियों का दानव समाज हमारे बचे हुए सनातन के रत्न भी छीन लेंगे.
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